शेर-ओ-शायरी

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खुदा गवाह है कि अब काटे से नहीं कटती,
यह इन्तिजार की रातें, ये इन्तिजार के दिन।

-जोश मलीहाबादी

 

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खुदा जाने मुहब्बत कौन-सी मंजिल को कहते हैं,
न जिसकी इब्तिदा ही है न जिसकी इन्तिहा ही है।
-जिगर मुरादाबादी


1.इब्तिदा- आरम्भ, शुरूआत 2.इन्तिहा- पराकाष्ठा, आखिरी हद, चरमसीमा

 

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खुदा जाने तुमने किस अन्दाजे-नजर से देखा है
कि मुझको जिन्दगी अब जिन्दगी मालूम होती है।
-कैफी चिड़िया कोटी

 

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खुदाया जज्बए-दिल क़ी मगर तासीर उल्टी है
कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाये हैं मुझसे।

-मिर्जा गालिब

 
1.खुदाया - हे खुदा 2.जज्बए-दिल - दिल की कशिश

 

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